Supreme Court of India ने मार्च 2025 में दिए गए Allahabad High Court के उस विवादास्पद आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें आरोपी के कृत्य को दुष्कर्म का प्रयास मानने से इनकार किया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि किसी महिला या नाबालिग के पायजामे का नाड़ा खोलना और कपड़े उतारने की कोशिश महज छेड़छाड़ नहीं, बल्कि दुष्कर्म के प्रयास की श्रेणी में आता है।
मामला उत्तर प्रदेश का है। आरोप है कि कुछ लोगों ने एक नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़ की, उसका पायजामे का नाड़ा तोड़ा और उसे पुलिया के नीचे घसीटने की कोशिश की। हालांकि, राहगीरों के हस्तक्षेप के कारण आरोपी मौके से फरार हो गए।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (दुष्कर्म) और पोक्सो अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत गंभीर आरोप तय किए थे। लेकिन मार्च 2025 में हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इसे दुष्कर्म का प्रयास न मानते हुए केवल अपराध की तैयारी और महिला की गरिमा भंग करने जैसा कम गंभीर अपराध बताया था। इस फैसले के बाद व्यापक स्तर पर विरोध और आक्रोश सामने आया था।
एनजीओ ‘वी द वुमन’ की संस्थापक एवं वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता के पत्र पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई की। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि ऐसे कृत्य को कमतर आंकना न्याय की मूल भावना के विपरीत है। पायजामे का नाड़ा खोलना और कपड़े उतारने का प्रयास सीधे तौर पर दुष्कर्म के प्रयास के समान है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायालय तभी पूर्ण न्याय कर सकता है, जब वह मामले की वास्तविक परिस्थितियों और पीड़िता की संवेदनशील स्थिति को समझते हुए निर्णय दे। न्यायिक फैसलों में कानूनी सिद्धांतों के साथ करुणा और संवेदनशीलता का समावेश भी आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ पोक्सो अधिनियम के तहत दुष्कर्म के प्रयास के मूल और कठोर आरोप बहाल कर दिए हैं। साथ ही, न्यायालय ने महत्वपूर्ण पहल करते हुए National Judicial Academy के निदेशक एवं पूर्व न्यायाधीश अनिरुद्ध बोस को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों के लिए सरल और संवेदनशील भाषा में दिशा-निर्देश तैयार करेगी, ताकि न्याय प्रक्रिया में सहानुभूति और संवेदनशीलता सुनिश्चित की जा सके।